नागेश्वर ज्योतिर्लिंग शोध एवं मान्यता

शोधकर्ता श्री राजेश दीक्षित के अनुसार ‘‘दारूका’’ दैत्य दम्पत्ति का परिक्षेत्र होने के कारण ही नागेशं दारूका वन कहलाता है।
याम्ये सदड्गें नगरेऽतिरम्ये
विभूषिताड्गं विविधैश्च भोगैः
सद्भक्ति मुक्तिप्रदमीशमेकं
श्री नागनाथं शरणं प्रपद्ये
तात्पर्य यह कि “जो दक्षिण के अत्यन्त रमणीक सदड्गें नगर में विविध भोगों से सम्पन्न होकर सुन्दर आभूषणों से विभूषित हो रहे हैं, जो एकमात्र सद्भक्ति और मुक्ति को देने वाले हैं उन प्रभु श्री नागनाथ की मैं शरण में जाता हूं”। जगतगुरू आदि शंकराचार्य ने श्री नागनाथ ज्योतिर्लिंग के याम्ये अर्थात् दक्षिण दिशा में स्थित होने के कारण आद्य ज्योतिर्लिंग के रूप में चिहिन्त किया था।’’  औंढ़ा का प्राचीन नाम सदड्गें था श्लोक में ‘याम्ये सदड्गें नागरे’ उल्लेखित है। अब चूंकि महाराष्ट्र दक्षिण दिशा में है जबकि उत्तराखण्ड का श्री जोगेश्वर और गुजरात का श्री नाग नागेश्वर मंदिर पश्चिम दिशा में हैं इसलिये श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को ही द्वादश ज्योतिर्लिंगों के रूप में सर्वमान्य माना जायेगा।

गुजरात के सुप्रसिद्ध लेखक स्वर्गीय श्री रमेश ठाकर की किताब ‘द्वादश ज्योतिर्लिंग’ में  लेखक ने अपने सृजनात्मक लेखन के माध्यम से दारूकावन को कथानक के साथ व्याख्यायित किया है। दैत्य दम्पति दारूक और दारूकी भारत के पश्चिमी तटवर्ती जंगलों में वास करते थे दारूक नास्तिक था जबकि दारुकी आस्तिक।

दारूकी ने भगवती पार्वती को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह जहां-जहां जाएगी जंगल और पानी भी उसके साथ-साथ जाएंगे। दारूक और दारूकी दंभवश ऋषि मुनियों के धर्मादि कार्यों में विध्न डालने लगे थे। पीड़ित प्रजा प्रतापी महर्षि और्व की शरण में गई। महर्षि और्व द्वारा किये गए अनुष्ठानों से इंद्रादि देव सहायतार्थ एकत्रित होने लगे, यह देख दैत्यराज दारूक और दारूकी गोदावरी नदी के उत्तर प्रान्त में स्थित निर्मल नामक गिरिमाला पर रहने चले गये। यहां उन्होंने गिरिवासिनी प्रजा पर अधिकार प्राप्त कर लिया और तभी से यह वनविटप ‘दारूक वन’ के नाम से जाना गया। एक बार गोदावरी नदी में तैरती हुई अनेक श्रेष्ठ नौकाएं पहुंचीं। दानव दस्युओं ने नौकाओं पर धावा बोल दिया और सभी यात्रियों को बंदी बना लिया इन्हीं में से सुप्रिय नामक परम शिव भक्त वैश्य भी था।

वह विधिवत शिवलिंग पूजनोंपरान्त ही आहार ग्रहण करता था। एक बार सुप्रिय को दत्तचित पूजन करता देख दारूक के विश्वास पात्र दैत्य ने स्वामी दैत्यराज तक यह समाचार पहुंचा दिया और वह पूरे सैन्यबल के साथ बंदीगृह में आ धमका। अपने ऊपर हुए अप्रत्याशित आक्रमण से तनिक भी विचलित हुए बिना सुप्रिय ने कहा मैं महादेव शंकर का उपासक हूं उन्हीं की पूजा कर रहा हूं और वह पुनः शिव साधना में जुट गया।

शिव जी तो परोक्ष रूप से स्वयं वहां उपस्थित थे ही जब उन्होंने देखा कि उनके भक्त पर आक्रमण हो रहा है, उन्होंने विषधर सर्प का रूप धारण कर दारूक को डंस लिया। यहीं नहीं समस्त दैत्यों का भी सर्वनाश कर दिया। दानवों की यन्त्रणा से मुक्ति प्रदाता उदारमना शंकर जी से सुप्रिय ने करबद्ध प्रार्थना कर वन क्षेत्र में निवास करने का निवेदन किया। तभी से त्रिलोकेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग स्वरूप में यहां आर्विभूत हुए।

ज्योतिर्लिंग को श्री नागनाथ नाम से सम्बोधित कर भक्तिभाव से पूजन अर्चन प्रारम्भ हुआ और यह पवित्र शिव धाम दारूक वन स्थित आद्य ज्योतिर्लिंग श्री नागेश्वर के रूप में विख्यात हुआ। लेकिन शक्ति उपासिका दारूकी ने पार्वती जी को पुकारा।

पार्वती जी के अनुरोध पर शिवजी ने दारूक वन में दारूकी के वंश के विद्यमान रहने की उद्घोषणा की। साथ ही यह भी कहा कि सतयुग के आरम्भ में वीरासेन नामक महाप्रतापी महाराज जब भक्ति भाव से दर्शन करने यहां आयेगा वह दिग्विजयी होकर दैत्यों का संहार कर समूल नष्ट कर देगा।

लेखक रमेश ठाकर जी आगे यह भी लिखते हैं कि द्वारका के आस-पास का भूतल इस प्रकार का है कि वहां जंगल की संभावना कदापि नहीं बनती।

आरती समय सारणी

प्रातःकाल- ५:३० बजे मंदिर खुल जाता है/मध्याह्न १२ बजे महाभोग और आरती/दोपहर ४ से ४:३० तक मध्याह्न स्नान/रात को ८:३० से ९:०० तक शयन आरती/ रात को ९:०० बजे मंदिर बंद हो जाता है/प्रातःकाल से दोपहर ४:०० बजे तक शिव जी को जल और दूध चढ़ाया जा सकता है

महाशिवरात्रि और श्रावण सोमवार को मंदिर की समय सीमा  बढ़ाई जाती है

प्रतिदिन का विडियो