नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गर्भगृह एवं कथा

शिवालय साढ़े पांच बजे खुलता है। बारह बजे महाभोग और आरती के दौरान मंदिर परिक्षेत्र नगाड़ों की अनुगुंज से गुंजायमान रहता है। दोपहर 4 से 4.30 बे मध्यान्ह स्नान, साढ़े 8 बजे से 9 बजे तक शयन आरती की जाती है।

शयन आरती के उपारान्त ताम्बूल और पेड़े का विशेष प्रसाद वितरित किया जाता है। प्रतिदिन पौरोहित्य कर्म से संलग्न दिव्य तीर्थस्थान के 30-32 पुरोहितों के घरों से चांदी की थाल में नैवेद्य सजाकर भोले नाथ के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें महाराष्ट्र के सभी लोकप्रिय व्यंजनों के अतिरिक्त पूरन पोली भी सम्मिलित की जाती है।

मान्यता है कि रात्रि में शयन आरती के पश्चात् महामृत्युजंय शिव शयन हेतु गर्भतल पर सुसज्जित शयन कक्ष में विश्राम करते हैं। इस पाण्डवकालीन शिवालय में वनवासी युधिष्ठिर ने अर्मदक झील के परिसर में एक स्वयभू शिवलिंग पर गायों द्वारा दुग्धधाराएं बहाए जाने की प्रक्रिया को देखा। ऊष्णजल में तेजोमयी पिण्डी को निकालने के लिए भीम ने गदा के प्रहार से बांध तोड़ने का उपक्रम किया। ऐसी किंवदंति है कि सूर्य के प्रकाश से भी कई गुना अधिक दैदीप्यमान इस पिण्डी के कारण रात और दिन में अन्तर कर पाना असंभव था। पाण्डवों ने बीस विफल प्रयास किये लेकिन पिण्डी के तेज को नहीं शान्त कर पाये। ऐसे में भीम ने गण्डकी नदी की बालु का लेपन किया और युधिष्ठिर ने पिण्डी की विधिवत स्थापना की। यही कथा सर्व श्रुत भी है। ज्योतिर्लिंग के संस्पर्श से आप बालू की उपस्थिति को अनुभूत कर पाऐंगे। यहां गर्भ तल में लगाये गये वाताकूलन यंत्रों वाली मंदिर ट्रस्ट की सुचारू कार्यप्रणाली का उल्लेख करना आवश्यक होगा। जो गर्भगृह को निरंतर हवादार बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जलाभिषेक के उपरान्त उपासक को क्रमबद्ध रस्सी के सहारे ऊपर उठाने के उपक्रम में सेवादारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती हैं।

गर्भतल पर ऊपर आने पर किरीट मुकुटधारी पद्म शंख आयुध और अलंकरण युक्त केशिराज की मूर्ति के दर्शन होते हैं। संत नामदेव काल की यह सुधामयी दिव्य विष्णुमूर्ति 1973 मंदिर की आग्नेय दिशा से प्राप्त हुई थी। शिव की कितनी आनंदमयी लीलाएं हैं सच्चिदानंद शिव की अपनी अंशकला के द्वारा ही वह ब्रम्हा, स्वप्रभावमय विष्णु और परमाराध्य रूद्र के रूप में संसार की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हैं तथा माया संवालित होकर त्रिविध रूप धर लेते हैं।

इतिहास

आद्य ज्योतिर्लिंग नागेश्वर: आशुतोष शिव का आठवां दिव्य धाम

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में औंढा स्थित आद्य ज्योतिर्लिंग नागेश्वर मंदिर अलंकृत विलोभनीय हेमाड़पन्तीशैली में निर्मित है। 60000 वर्ग फीट में विस्तारित शिवतीर्थ का प्रांगण 6 मीटर ऊंची प्राचीर से सुरक्षित है। जिसमें चार प्रवेश द्वार हैं। भव्य परिसर के मध्य में लगभग 7200 वर्गफीट क्षेत्र में फैले 75 फीट चौड़े 150 फीट लम्बे तथा 8 फीट ऊंचे काले प्रस्तर खण्डों के चबूतरे पर स्थित इस शिवालय के 60 फीट ऊपरी भाग पर कलश है।

संकीर्ण मार्ग से होते हुए सीढ़ियों से निज मंदिर के गर्भतल में उतरने पर गर्भगृह में स्वयंभू ज्योर्तिमय शिवलिंग का लगभग डेढ़ फीट ऊंचा अर्चा विग्रह प्रतिष्ठित है। साढ़े 25 फीट लम्बाई, साढे़ 22 फीट चौड़ाई और साढ़े 4 फीट ऊंचाई वाले चार स्तम्भों पर आधारित गर्भगृह की ऐसी व्यवस्था सर्वथा विस्मयकारी है। गर्भगृह में शिव और विष्णु का हरिहरेक्य ज्योतिर्मय स्वरूप विद्यमान है।

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आरती समय सारणी

प्रातःकाल- ५:३० बजे मंदिर खुल जाता है/मध्याह्न १२ बजे महाभोग और आरती/दोपहर ४ से ४:३० तक मध्याह्न स्नान/रात को ८:३० से ९:०० तक शयन आरती/ रात को ९:०० बजे मंदिर बंद हो जाता है/प्रातःकाल से दोपहर ४:०० बजे तक शिव जी को जल और दूध चढ़ाया जा सकता है

महाशिवरात्रि और श्रावण सोमवार को मंदिर की समय सीमा  बढ़ाई जाती है

प्रतिदिन का विडियो